यही है कलेक्टर के पद की गरिमा..?

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हेमंत आर्य। पिछले कुछ समय से अपने निर्णयों को लेकर चर्चा में आई शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की टिप्पणियों और फटकार ने जिले में कलेक्टर के पद की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के लोगों ने आजादी के बाद से ही यहां पदस्थ किसी भी कलेक्टर की कार्यप्रणाली को लेकर हाईकोर्ट की इतनी तीखी और तल्ख टिप्पणियां शायद कभी नहीं सुनी होंगी। इसके बावजूद सरकार, सत्ताधारी दल और उसके जन प्रतिनिधियों की चुप्पी समझ से परे हैं। जिले के आम लोगों के मन मस्तिष्क में अब यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में कलेक्टर पद की गरिमा यही है ?
गौरतलब है कि पिछले करीब 28 माह पहले शाजापुर जिले में पदस्थ हुई कलेक्टर ने कार्यभार संभालते ही व्यवस्थाओं में सुधार के बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन वो सभी धरातल पर आकार लेते हुए कम ही दिखाई दिए। पिछले करीब 28 माह के दौरान जिले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में ऐसी कोई विशेष कसावट दिखाई नहीं दी, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश, भू माफियाओं-खनन माफियाओं, शासकीय-गौचर भूमि पर अवैध अतिक्रमण करने वालों पर नकेल कसने के लिए सख्ती से सतत प्रभावी कार्रवाईयां की गई हो। जिले के कुछ जन प्रतिनिधियों के इशारों पर औपचारिकता के लिए इनके अधिनस्थों से आदेश निकलवाए गए और पर्दे के पीछे समझौते कर कार्रवाईयों को अंजाम तक पहुंचने से पहले ही ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इस कारण जिले के कुछ जन प्रतिनिधि ही इनके कार्यकाल से संतुष्ट नजर आते हैं। जिले के एक विधायक ने तो सार्वजनिक रूप से कार्यक्रम में यहां तक कह दिया था कि मैंने अपने राजनीतिक जीवन में ऐसा कलेक्टर आज तक नहीं देखा। कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की तल्ख और तीखी टिप्पणियों के बाद अब यह बात समझ से परे है कि जज साहब सही है या ये विधायक महोदय। हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियों के बाद अब इन विधायक महोदय को कलेक्टर के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। अपने निजी स्वार्थों के लिए अफसरशाही के सामने इतने नतमस्तक होने वाले जन प्रतिनिधि भी जिले के लोगों ने शायद ही पहले कभी देखे होंगे।
विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा शाजापुर जिले में किए गए गलत टिकिट वितरण और उसकी आपसी गुटबाजी के कारण सत्ता सुख भोगने वाले नेता शायद ये भूल गए हैं कि उनका गोल्डन टाईम (आधा कार्यकाल) बीत चुका है और उल्टी गिनती शुरू हो गई है। यदि अब भी ये अधिकारियों के चरण चुंबन में ही लगे रहे तो आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाता निर्ममता के साथ इन्हें घर बैठा देंगे। उसके बाद इनके चंद चापलूस, चाटुकारों के अलावा बाजार में कोई इन्हें नमस्कार करने वाला भी नहीं मिलेगा। इसलिए अब इन नेताओं को ठेकेदारों और दलालों के बजाए समय रहते आम मतदाताओं का जन प्रतिनिधि बन जाना चाहिए।
बहरहाल करीब 28 माह के कार्यकाल में विवादों के अलावा कलेक्टर जिले के लोगों पर अपनी कार्यप्रणाली की कोई विशेष छाप छोड़ पाने में पूरी तरह विफल रहीं। कार्यकाल के दौरान इनके खिलाफ प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ को भी मोर्चा खोलना पड़ा था और अब इनके अधीनस्थों ने ही इनकी कार्यप्रणाली को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की लगातार फटकार और तीखी, तल्ख टिप्पणियां जिले के आम लोगों के मन मस्तिष्क में इस पद की गरिमा को धूमिल कर रही है। इसके बावजूद उक्त अधिकारी का पदस्थ रहना जिले के जन प्रतिनिधियों और सरकार की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है ?

हेमंत आर्य
                       हेमंत आर्य
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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