राकेश अचल। देश में वोट चोरी को लेकर बवाल मचा हुआ है। मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुंचा। बड़ी अदालत ने बड़प्पन दिखाया और चोरी जैसे घटिया अपराध के लिए अपना कीमती वक्त जाया किया। वोट चोरी रोकने के लिए कुछ निर्देश दिए, वो भी वोट चोरी के आरोपी केंचुआ को। केंचुआ अर्थात केंद्रीय चुनाव आयोग। सुविधा के लिए हम सब इसे केंचुआ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट को ईडी कहते हैं। वैसे नाम बिगाड़ने में हम भारतीयों का कोई मुकाबला नहीं। हम देवी प्रसाद त्रिपाठी को डीपीटी तो जुल्फकार अली भुट्टो को जुल्फी कहने से नहीं चूके तो केंचुआ किस खेत की मूली है।
बात चोरी की चल रही है। जिसके आसपास जो होता है वो उसे ही चुराता है। केंचुआ के आसपास चूंकि वोटर लिस्ट होती है सो उसने वोट चुराना शुरु कर दिया। केंचुआ ने चोरी भी की और सीनाजोरी भी, लेकिन अपने लिए नहीं। जो किया परहित में किया, क्योंकि केंचुआ ने कहीं पढ़-सुन लिया था कि ‘परहित सरस धरम नहिं भाई’। बेचारा केंचुआ सत्तारूढ़ दल के लिए वोट चोरी करते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया। बहरहाल हम चोरी पर लौटते हैं। चोरी हमारा सनातन पेशा है, राष्ट्र धर्म है। त्रेता में रावण ने सीता माता को चोरी किया, द्वापर में भगवान कृष्ण निगरानीशुदा माखन चोर बने। उन्हें किसी ने चितचोर भी कहा, लेकिन उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। उस जमाने में सुप्रीम कोर्ट जैसा कुछ था नहीं सो अपील ज्यादा से ज्यादा माता-पिता तक ही हो पाती थी। हमारे कान्हा पर तो नींद चुराने, चैन चुराने और बंशी पर डाका डालने तक के इल्जाम लगे।
हमारे यहां कलियुग में नारे, घोषणा पत्र अक्सर चोरी हो जाते हैं। साहित्य में चोरी जग जाहिर है। आइडिया चोरी भी आम बात है। चोरी रोकने के लिए पुलिस बनी, कानून बने, अदालतें बनीं, लेकिन चोरी पूर्ववत, यथावत धड़ल्ले से जारी है। जारी हो भी तो क्यों न हो भला ? चोरी तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र है, पहचान है। इसीलिए हम गर्व करते हैं कि ‘हम सब चोर हैं’। चोरों की दो आंखें बारह हाथ होते हैं। फिल्म वाले कहानियां, संगीत और जाने क्या-क्या चुरा लेते हैं। भारत में चोरी, नकबजनी, डाका आम बात है। इन्हें अंग्रेजों की आईपीसी नहीं रोक सकी तो सरकार ने भारतीय न्याय संहिता रच डाली। आईपीसी और बीएनएस में धाराएं ही उलट-पलट की गई और कुछ नहीं। हमारा अनुभव है कि हम आकाश को जमीन पर उतार सकते हैं। चूंकि चरित्र है, चोरी पुरुषार्थ है, चोरी एमएसएमई है। चोरी चाल है, चोरी चरित्र है और चोरी पहचान भी है। जो चोरी नहीं कर सकता वो कुछ भी नहीं कर सकता। इसीलिए कहता हूं कि आदमी का मूल तत्व मरना नहीं चाहिए। आदमी का मूल चरित्र चोरी करने का है, इसे महफूज रखना चाहिए। इसीलिए हमारे यहां कहा जाता है कि ‘चोर चोरी से अलग हो सकता है, हेराफेरी से नहीं’। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ या ‘चोरी और सीनाजोरी’ जैसी कहावतें भी प्रचलित हैं।
चोर चरित्र पर हास्य, व्यंग्य, कहानी, कविता, इतिहास, संस्कृति सबकुछ है। जो चोरी करने से घबरा जाते हैं, वे फरियादी बन गए, गवाह बन गए, वकील बन गए। जो कुछ नहीं बन पाए वे सब नेता बन गए। कोई किसी दल में, कोई किसी दल में समा गया। मां में जैसे मातृत्व होता है, पिता में पितृत्व होता है, पशुओं में पशुत्व होता है, ठीक इसी तरह चोरों में चोरत्व होता है। वोट चोर इस समय सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित (बदनाम) है। भारत में हर कोई डॉक्टर, वकील, आईएएस, आईपीएस, आईईएस शायद न बनना चाहे, लेकिन वोट चोर जरूर बन जाता है। चारा, दवा, सीमेंट, दलिया सब तो चुरा चुके हैं आदमी। आपको पता है कि हमारे यहां चोर अक्सर सफाचट यानि क्लीनशेव होते हैं। चोर अगर गलती से दाढ़ी रख ले तो लोग कह उठते हैं कि ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ होता है और इसी तिनके से चोर पकड़ा भी जाता है। चोर को जब आदमी नहीं पकड़ पाता तो पुलिस का कुत्ता इस काम को अंजाम देता है। हम अपना परिचय ये कहकर गर्व से देते हैं कि ‘चोरी मेरा काम’। हमारा चोर पुलिस से नहीं डरता तो माननीय अदालत से क्या खाक डरेगा। हमारा चोर भगवान के मंदिर से कलश, दान पेटी, छत्र, आभूषण और मूर्ति तक चुरा लेता है।
चोर अपनी बात कहीं भी रखने के लिए परम स्वतंत्र है। चोर के लिए लाल किला हो, नीला किला हो, मधुबनी हो या मुंबई कोई फर्क नहीं पड़ता। चोर हर महफिल में मिल सकता है। ढोल बजाते, भजन करते, ध्यान मग्न होते, खिलखिलाते, आंसू बहाते, सेना की वर्दी हो या संत की कोई फर्क नहीं पड़ता। आप न वोट चोर को पकड़ सकते हैं न नोट चोर को। चोर किसी के हाथ नहीं आता। इसलिए बस जागते रहो। ऊपर वाले से दुआ करते रहो कि देश को चोरों से भी आजादी मिले।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Author: Hindusta Time News
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