हेमंत आर्य। चुनाव के समय किसी पार्टी के लिए देव तुल्य तो किसी पार्टी के बब्बर शेर कार्यकर्ताओं को सत्ता हांसिल होने के बाद कितनी तवज्जो मिलती है, इसके उदाहरण आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। जमीनी कार्यकर्ताओं की तो बात ही छोड़ दीजिए, मध्यप्रदेश में तो जिले के पदाधिकारी देव तुल्य कार्यकर्ता भी लाल फ़िताशाही की दुर्भावना का शिकार हो रहे हैं, लेकिन सत्ता-संगठन ने मौन की चादर ओढ़ रखी है।
गौरतलब है कि किसी क्षेत्रीय दल की मजबूत उपस्थिति नहीं होने के कारण मध्यप्रदेश की राजनीति देश के दो प्रमुख दलों के आसपास ही घूमती है। चुनाव के समय एक दल अपने कार्यकर्ताओं को देव तुल्य बनाकर तो दूसरा दल बब्बर शेर बनाकर अपने काम करा लेता है। एक दल के बब्बर शेर कार्यकर्ताओं का तो डीएनए देश की गुलामी के समय से ही गलत का विरोध करने का रहा है, इसलिए वो अपनी पार्टी के ही गलत निर्णयों का विरोध करने में लगे हुए हैं और उसे विगत 20 सालों से सत्ता में ही नहीं आने दे रहे हैं। बब्बर शेर कार्यकर्ताओं की पार्टी का प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व भी इतना शेर दिल है कि भले ही पार्टी सत्ता से दूर रहे, लेकिन वो भी अपनी गलतियां सुधारने को तैयार नहीं हैं। इस पार्टी का न प्रदेश नेतृत्व सुधरने के लिए तैयार है और ना ही कार्यकर्ता अपना डीएनए बदलने को राजी है। ऐसे में मध्यप्रदेश में ठेके पर चल रही इस पार्टी का तो भगवान ही मालिक है।
अब बात करते हैं देव तुल्य कार्यकर्ताओं वाली पार्टी की। पिछले काफी लंबे समय से मध्यप्रदेश की सत्ता में होने के कारण इस पार्टी का भी चाल, चरित्र और चेहरा बदल गया है। पार्टी के नए चाल, चरित्र और चेहरे में अब उस दल का कार्यकर्ता ही अपने आपको असहज और उपेक्षित महसूस करने लगा है। इसके कई उदाहरण आए दिन प्रदेश में देखने को मिलते रहते हैं। देव तुल्य कार्यकर्ताओं में बब्बर शेर कार्यकर्ताओं की तरह खुलकर अपनी पार्टी का विरोध करने की हिम्मत तो है नहीं, क्योंकि उन्हें मानसिक रूप से तैयार ही उसी तरह किया जाता है। साथ ही उनका डीएनए भी विरोध का नहीं रहा, इसीलिए देव तुल्य कार्यकर्ता इन दिनों अंदर ही अंदर घुट रहा है। कार्यकर्ताओं की घुटन अब अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुकी है, इसके चलते शाजापुर जिले की एक विधानसभा के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में बब्बर शेर बनने का मन बना लिया है। शीघ्र ही इस विधानसभा के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में जोर-शोर से अपनी पार्टी बदलकर सत्ता के मद में चूर संगठन को आईना दिखाएंगे। हालांकि ये कार्यकर्ता कुएं से बचकर खाई में कूदने जा रहे हैं, लेकिन प्रदेश में कोई तीसरा मजबूत विकल्प नहीं होने के कारण ये उनके लिए मजबूरी बन गया है। सत्ता के साथ रहते हुए घुटने से अच्छा है कि विपक्ष में रहकर आम लोगों की आवाज को तो उठाया ही जा सकता है।
फिलहाल शाजापुर जिले के देव तुल्य और बब्बर शेरों के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जो उनके अधिकारों की लड़ाई हर मोर्चे पर लड़ सके। ऐसे में लोगों द्वारा शाजापुर जिले के दिग्गज सहकारिता नेता और पूर्व विधायक स्व. मनोहर सिंह जी को सोशल मीडिया पर याद किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर इन दिनों स्व. सिंह का वो कार्य याद किया जा रहा है, जब उन्होंने अपने एक कार्यकर्ता पर दुर्भावनापूर्ण पुलिसिया कार्रवाई को लेकर रातों रात एसपी का तबादला करा दिया था। तबादला आदेश के साथ ही तत्कालीन कांग्रेस सरकार को आधी रात में ही उक्त पुलिस अधीक्षक को रिलीव कर मुख्यालय छोड़ने के आदेश भी जारी करने पड़े थे। पार्टी कार्यकर्ताओं के हित में स्व. सिंह ने ऐसी कई लड़ाईयां शासन और प्रशासन से लड़ी जो आज भी जिले की राजनीति में इतिहास के रूप में दर्ज है। उनके बाद जिले की राजनीति में ऐसा कोई दबंग नेता नहीं हुआ, जिसने पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए छोटे-मोटे कर्मचारी तो दूर की बात आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को भी नहीं बक्शा था। जिले की वर्तमान राजनीति में स्व. सिंह की तरह कार्यकर्ताओं की लड़ाई लड़ने वाला नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता।
वर्तमान में जिले में राजनीति करने वाले सभी दलों के नेता बहुत होशियारी से सोच समझकर काम करते हैं। किसी भी कार्यकर्ता का कोई भी काम करने से पहले वे सारे समीकरण देखते हैं, फिर अपने व्यावसायिक हितों के नफे-नुकसान का आंकलन करते हैं, इसके बाद काम करना है या नहीं उसके बारे में सोचते हैं। हाल ही में शाजापुर जिले में सत्ताधारी दल के एक देव तुल्य कार्यकर्ता व पार्टी के जिला पदाधिकारी और पत्रकार संघ जिला अध्यक्ष पर प्रशासन ने दुर्भावनापूर्ण प्रशासनिक कार्रवाई की, लेकिन सबकुछ जानते हुए भी चाल, चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाली पार्टी का एक ताकतवर नेता खुलकर उनके समर्थन में नहीं आया। प्रशासनिक अधिकारियों पर कार्रवाई होना तो दूर की बात, उक्त कार्यकर्ता के समर्पण को भूलकर पार्टी के कई पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि पर्दे के पीछे प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खड़े नजर आए। ऐसे राजनीतिक माहौल में प्रताड़ित और उपेक्षित देव तुल्य कार्यकर्ता कब तक पार्टी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रह पाएंगे ये कह पाना मुश्किल है। हालांकि अब देव तुल्य कार्यकर्ता भी धीरे-धीरे दबी जुबान में विरोध करने लगे हैं, लेकिन फिर भी वे बब्बर शेरों की बराबरी कभी नहीं कर पाएंगे। देव तुल्य कार्यकर्ताओं वाली पार्टी के नेताओं को पता है कि प्रदेश में बब्बर शेर कार्यकर्ताओं की पार्टी अभी भी नहीं सुधरी है, इसलिए वो आगामी समय में होने वाले पंचायत व नगरीय निकाय चुनावों तक तो जीत के प्रति पूर्णतः आश्वस्त हैं। उसके बाद जो परिस्थिति बनेगी उस पर बाद में निर्णय ले लेंगे।
बहरहाल मध्यप्रदेश में जब तक किसी तीसरे राजनीतिक दल की मजबूत उपस्थिति नहीं होती, तब तक देव तुल्य और बब्बर शेरों की सिर्फ चुनावों तक ही पूछ परख होगी, उसके बाद उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दिया जाएगा। क्योंकि सत्ता हांसिल होने के बाद नेताओं का हिसाब-किताब लंबा-चौड़ा हो जाता है और उन्हें इसके लिए व्यापारियों, ठेकेदारों, एजेंटों और मुनिमों की जरूरत होती है कार्यकर्ताओं की नहीं। यह बात किसी भी दल के कार्यकर्ता जितनी जल्दी समझ पाए उनके लिए उतना ही अच्छा है, क्योंकि कैडर बेस कार्यकर्ताओं वाली पार्टी का संगठन भी अब सत्ता के आगे बौना दिखाई देने लगा है।

Author: Hindusta Time News
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