पितृ पक्ष: किसका ग्रहण, किसका पिंडदान ?

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राकेश अचल। हम सनातनियों के पास हर काम के लिए अवसर ही अवसर और परंपराएं ही परंपराएं हैं। हम अपना शुभ, अशुभ खुद चुन सकते हैं, लेकिन चुनते नहीं हैं। हमारे यहां योग-संयोग भी खूब बनते बिगड़ते हैं। ये अच्छे भी होते हैं और बुरे भी, इसीलिए हम दुनिया के दूसरे हिस्सों से भिन्न हैं। भारत में 7 सितंबर रविवार यानि आज से पितृ पक्ष शुरु हो गया है। पितृ पक्ष को कोई श्राद्ध पक्ष कहता है तो कोई कड़वे दिन। कोई महालय पक्ष कहता है तो कोई अपर पक्ष कहता है। हमारे यहां कनागत कहते हैं तो कहीं जितिया और सोलह श्राद्ध भी कहा जाता है। इसे कुआर या आश्विन के कृष्ण पक्ष के रूप में भी जाना जाता है। पितृ पक्ष का नाम एक विधान, एक निशान या एक देश, एक चुनाव जैसा नहीं किया जा सकता।
पितृ पक्ष की तरह दुनिया के हर देश में कोई न कोई आयोजन होता है। चीन में पितृ पक्ष की तरह चिंग मिंग उत्सव या टोंब स्वीपिंग डे मनाया जाता है। ये हर साल अप्रैल में मनाया जाता है। लोग अपने पूर्वजों की कब्र साफ करते हैं, भोजन, फूल और कागज़ की बनी वस्तुएं चढ़ाते हैं। यह पितृ पक्ष जैसा ही है, बस वहां कब्रों पर जाकर श्रद्धांजलि दी जाती है। जापान में पूर्वजों के लिए ओबोन उत्सव होता है। ये अगस्त में मनाया जाता है। मान्यता है कि इन दिनों पूर्वजों की आत्माएं घर आती हैं। लोग दीपक जलाते हैं, नृत्य (बोन ओडोरी) करते हैं और मंदिरों में पूजा करते हैं। कोरिया में पितृ पक्ष का नाम चुसोक है। ये सितंबर–अक्टूबर में होता है। इसे “हार्वेस्ट फेस्टिवल” भी कहते हैं। लोग अपने पूर्वजों को भोजन अर्पित करते हैं और परिवार मिलकर उनकी याद में अनुष्ठान करते हैं। मैक्सिको में इसे डे ऑफ द डेड कहा जाता है, ये 1–2 नवंबर को मनाया जाता है। लोग कब्रों को सजाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, रंग-बिरंगे खोपड़ी के प्रतीक और फूलों से सजावट करते हैं। यह बहुत रंगीन और उत्सव जैसा माहौल होता है। फिलीपींस वाले अरो नग मगा पटाय के रूप में अपने पूर्वजों को याद करते हैं। ये 1 नवंबर को मनाया जाता है। परिवार कब्रिस्तान जाते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं और पिकनिक जैसा माहौल बनाकर पूर्वजों को याद करते हैं। मिस्र (प्राचीन काल में) “फेस्टिवल ऑफ द डेड” मनाया जाता था। मृतकों की आत्मा को संतुष्ट करने के लिए भोजन और भेंट दी जाती थी। ईसाई परंपरा में इसे ऑल सेंट्स डे और ऑल सोल्स डे कहते हैं। इस्लाम वाले शबे बारात मनाते हैं।
भारत में ये काम पूरे 15 दिन चलता है। भारत में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) हिंदू परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा के अगले दिन से (पितृ पक्ष अमावस्या तक, लगभग 15 दिन) मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पूर्वजों की आत्माओं का स्मरण और तर्पण करना है। पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण, पूर्वजों के नाम से जल, तिल और पिंडदान (चावल के गोले) अर्पित किए जाते हैं। यह प्रायः नदी, तालाब या किसी पवित्र जल स्थल पर किया जाता है। भोजन अर्पण, पितरों को भोजन समर्पित किया जाता है, जिसे बाद में ब्राह्मणों, पंडितों या जरूरतमंदों को खिलाया जाता है। भोजन में खासतौर पर खीर, पूड़ी, दाल, कद्दू, चावल, घी आदि बनाए जाते हैं। दान-पुण्य कपड़े, अनाज, सोना-चांदी, पात्र और दक्षिणा का दान किया जाता है। मान्यता है कि यह पितरों को शांति और परिवार को आशीर्वाद देता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों का आह्वान, श्राद्ध करते समय “पितृ देवताओं” और तीन पीढ़ियों तक के पूर्वजों (पिता, दादा, परदादा आदि) को स्मरण किया जाता है। कभी-कभी मातृ पक्ष के लोग भी शामिल किए जाते हैं। इसके लिए व्रत और नियम हैं। श्राद्ध करने वाला (कर्म कांडी व्यक्ति) उस दिन सात्त्विक आहार लेता है। पितृ पक्ष में शुभ कार्य (जैसे शादी, गृह प्रवेश) नहीं किए जाते। पितृ पक्ष का अंतिम दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे पितृ अमावस्या या सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन सभी पितरों (जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात हो या न हो) का सामूहिक श्राद्ध किया जाता है। ये सब हम पूर्वजों के मोक्ष के लिए करते हैं और जब थक जाते हैं तो गयाजी जाकर पिंडदान और तिलांजलि देकर पितृ पक्ष मनाने से मुक्त हो जाते हैं। रामचरित मानस में प्रभु श्रीराम ने अपने पिता जनक का ही नहीं बल्कि गिद्ध राज जटायु का भी पिंड दान किया था, लेकिन मोक्ष की लालसा हम जीवितों में भी है। सगुनोपासक मोक्ष नहीं लेते। रामचरित मानस में कहा गया है कि-
‘सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं’॥
बहरहाल मेरा कहना है कि हमें न मोक्ष की कामना करना चाहिए और न वैतरणी पार करने की फिक्र करना चाहिए। हमारे पूर्वज तो तभी खुश हो सकते हैं, उन्हें तभी मोक्ष मिल सकता है जब हम घृणा का, ईर्ष्या का, सांप्रदायिकता का, वैमनस्य का, संकीर्णता का, कटुता का, कट्टरता का पिंड दान कर दें। इन सबको तिलांजलि दे दें। हमारे पूर्वज ऊपर से जब नीचे देखते हैं तो देश की दुर्दशा देखकर द्रवित हो जाते होंगे। हमारे पूर्वज असंख्य हैं जिन्होने इस देश को आजाद कराने में 1947 के पहले भी शहादतें दीं और बाद में भी। ये बात मुमकिन है आपको कड़वे दिनों की तरह कड़वी लगे, लेकिन इसकी जरुरत है, जांच कर देखिए। देश के लोकतंत्र को राहु-केतु से बचाना, मुक्ति दिलाना ही पितृ सेवा है। आज का चंद्र ग्रहण यही संदेश देता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

27 Years Experience Of Journlism

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