राकेश अचल। उपराष्ट्रपति पद पर पुराने जगदीप धनखड़ की जगह जो नए धनखड़ चुने गए हैं उनका नाम ही बदला है, लेकिन वे रहेंगे धनखड़ ही। नए धनखड़ माननीय सीपी राधाकृष्णन को बधाई देते हुए हम देश को आगाह करना चाहते हैं कि उसे नए धनखड़ से कोई बड़ी उम्मीद नहीं पालना चाहिए, क्योंकि वे एक तो स्वयंसेवक हैं दूसरे कारोबारी हैं। आज्ञाकारी तो होंगे ही।
नए उपराष्ट्रपति को ठीक उसी तरह चुना गया है जैसे पुराने को हटाया गया था। सरकार ने नए धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने के लिए अपने घोषित 439 मतों के होते हुए भी और मत जुगाडने के साथ ही प्रतिद्वंदी के मत कम करने में भी पूरी ताकत झोंकी और कामयाबी भी हासिल की। नए धनखड़ जिस सत्ताधारी गठबंधन के प्रत्याशी थे उसके पास केवल 439 वोट थे, लेकिन उन्हें मिले 452 वोट। अर्थात सत्ता प्रतिष्ठान ने अपना झंडा ऊंचा बनाए रखने के लिए 13 मत खरीदे। 15 अमान्य कराए और 13 सांसदों से मतदान का बहिष्कार कराया। विपक्ष के जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी हारकर भी जीत गए। विपक्ष के जिन 300 सांसदों ने संसद से केंचुआ के दफ्तर तक मार्च किया था वे तो एकजुट रहे, लेकिन तमाम छोटे दल विपक्ष के साथ खड़े रहने से डरकर पीछे हट गए। इस चुनाव में सरकार ने वोट चोरी नहीं किए, बल्कि सीनाजोरी कर हासिल किए। इसके लिए सत्तारूढ दल के रणनीतिकारों की तारीफ की जाना चाहिए, लेकिन इस कामयाबी को हासिल करने वालों को ये बात भी ध्यान रखना चाहिए कि उन्होंने लोकतंत्र के दग्ध जख्मों पर मरहम नहीं लगाई, बल्कि नमक छिड़का है।
नए धनखड़ भी राज्यसभा को उसी तरह चलाएंगे जैसे पुराने धनखड़ चलाते थे। एकांगी, ध्वनिमत से काम करने वाली राज्यसभा देश की मजबूरी है। पुराने धनखड़ का तो ह्दय परिवर्तन होने की गुंजाईश भी थी, लेकिन नए धनखड़ का नारंगी ह्दय किसी भी सूरत में बदल नहीं सकता। अब राज्यसभा के सदस्यों को अपने अधिकारों की रक्षा खुद करना पडेगी, क्योंकि नए धनखड़ 16 साल की उम्र से नागपुरी रंग में रंगे हुए है। नए धनखड़ साहब संघ के प्रति निष्ठावान हैं, लेकिन वे संविधान के प्रति भी निष्ठावान रहेंगे ये कहना कठिन हैं। वे सरल हैं, लेकिन उनकी रगों में व्यापार भी बहता है और गर्म सिंदूर भी। इसलिए देखना होगा कि वे राज्यसभा को कितना मजबूत या मजबूर बनाते हैं। वे ओबीसी से आते हैं, चार राज्यों के राज्यपाल रह चुके हैं इसलिए भाजपा और संघ को उन्हें लेकर कोई संदेह नहीं है, लेकिन बाकी विपक्ष के लिए वे संदेह से परे भी नहीं हैं।
अगले महीने 20 अक्टूबर को 68वें साल में प्रवेश करने जा रहे देश के 15वें उपराष्ट्रपति और दूसरे धनखड़ को नई जिम्मेदारी निभाने के लिए ईश्वर शक्ति दे, विवेक दे ताकि वे लोकतंत्र के इस उच्च सदन की गरिमा को बरकरार रख सकें। विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वो उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़े बी सुदर्शन रेड्डी को अब अकेला न छोड़े और उन्हें भी इस उच्च सदन का सदस्य बनाए, ताकि वे अपने अनुभव से नए उपराष्ट्रपति यानि सीपी राधाकृष्णन को धनखड़ बनने से रोकने में अपनी भूमिका और प्रभावी ढंग से निभा सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Author: Hindusta Time News
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