बिहार में वोटर बम विस्फोट की प्रतीक्षा

[the-subtitle]

SHARE:

राकेश अचल। लाल किला बम विस्फोट की सुर्खी अब केवल कुछ घंटे की मेहमान है, क्योंकि कल 14 नवंबर की दोपहर तक बिहार में वोटर बम का विस्फोट होने की संभावना है। वोटर बम विस्फोट से कोई जन हानि नहीं होगी बल्कि इस विस्फोट के बाद कहीं लड्डू बंटेंगे तो कहीं आतिशबाजी होगी।
भारत में वर्ष 2023 से अब तक करीब 11 विधानसभाओं के चुनाव हुए, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम पर सभी की नजर है। बिहार विधानसभा चुनाव वोट चोरी के गंभीर आरोपों और विवादास्पद एसआईआर के बीच हुआ है। बिहार से ही ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा पूरे देश में गूंजा है। 14 नवंबर 2025 को जब बिहार में ईवीएम खुलेंगी तब पता चलेगा कि वोट चोरी के आरोपियों को जनता ने दंडित किया है या क्षमा कर दिया है। चुनाव परिणाम आने के 72 घंटे पहले ही एक्जिट पोल करने वाली तमाम एजेंसियां बिहार में वोट चोरी की आरोपी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की सरकार बना चुकी हैं, लेकिन अधिकांश लोगों के गले ये नतीजे उतर नहीं रहे। इसीलिए सब बेसब्री से असली नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। ये नतीजे तय करेंगे कि क्या किसी महिला का वोट 10,000₹ पेशगी देकर खरीदा जा सकता है या नहीं ? पहले महिला मतदाताओं का वोट मात्र 1200₹ प्रति माह देकर खरीदा जा चुका है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लाड़ली बहनें भाजपा की या भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधनों की सरकारें बना चुकी हैं। बिहार में लाड़ली बहनों को भाजपा ने आजीविका दीदी बना दिया हैं।
भारत में जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 नेहरू के जमाने का है। तब वोट खरीदे और बेचे नहीं जाते थे, इसलिए नेहरू युग के इस कानून में वोट चोरी रोकने या एक्जिट पोल प्रतिबंधित करने की ताकत नहीं है। पिछले 11 साल में नेहरू ब्रांड जनप्रतिनिधित्व कानून लोकतंत्र को और चुनाव की शुचिता को बचाने में नाकाम साबित हुआ है, लेकिन अविश्वास के इस कठिन दौर में भी मतदाता विश्वसनीय बने हुए हैं। मतदाताओं ने बिहार से पहले जम्मू काश्मीर, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और झारखण्ड में भाजपा के चक्रवर्ती बनने के लिए छोड़े गए सत्ता के अश्व को रोका है। अब बारी बिहार की है।
बिहार बुद्ध का विहार क्षेत्र है। यहां की जनता बौद्ध हो सकती है, लेकिन बुद्धू नहीं हो सकती। बिहार के गुण सूत्र सांप्रदायिकता के विष से मुक्त हैं। बिहार के गुण सूत्रों में जातिवाद का विष है। हर नेता, हर दल जातिवाद के विष का संरक्षक भी है और वितरक भी। बिहार में इसीलिए कांग्रेस और भाजपा के अलावा वे तमाम राजनीतिक दल हैं जो जाति आधारित हैं। आप इन्हें हम, तुम या वीआईपी कह सकते हैं। राजद, जेडीयू भी जाति आधारित दल हैं, लेकिन सांप्रदायिक नहीं हैं। हमें उम्मीद भी है और लग भी रहा है कि बिहार भले ही कुशासन और दुशासन के लिए बदनाम दलों और नेताओं को चुन ले, लेकिन भाजपा जैसे घोषित सांप्रदायिक दलों को तो सत्ता में नहीं आने देगा। मनी, मसल और मशीन का गठजोड़ भी शायद प्रभावी साबित न हो। वैसे नारा तो ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का भी अभी प्रचलन में है।
हमारा आलेख न ग्रोक की देन है और न चैटजीपेट की उत्पत्ति। हमने जो भी लिखा है अपने तजुर्बे से लिखा है। हम किसी दल के वित्तपोषक लेखक भी नहीं है, इसलिए आप हमारे लेख पर भरोसा कर सकते हैं। वैसे भी अब कोई लेख या सर्वे जनादेश को प्रभावित नहीं कर सकता। बिहार की जनता अपना नेता, अपनी सरकार चुन चुकी है। आने वाले चार दिन तक सुर्खियों में लाल किला बम विस्फोट नहीं बिहार का जनादेश रहने वाला है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

27 Years Experience Of Journlism

Leave a Comment