दिग्विजय का झूठ भी सच और सच भी झूठ

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राकेश अचल। मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा को सुर्खियों में रहना खूब आता है। इन दिनों जब कांग्रेस हाईकमान मप्र में नए सिरे से संगठन सृजन में लगा है तब खुद को हासिए पर जाता देख दिग्विजय सिंह ने पांच साल पुराना विवादों का गड़ा मुर्दा उखाड़कर खुद को सियासी सुर्खी बना लिया। मुद्दा है पांच साल पहले कांग्रेस की सरकार गिराकर भाजपा के दत्तक पुत्र बन चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय की भूमिका का।
ग्वालियर के सिंधिया और राघौगढ़ के खीची घराने की अदावत तब की है जब भारत आजाद नहीं था। तब कांग्रेस भी नहीं थी। राघौगढ़ में दिग्विजय के पुरखे राज करते थे और ग्वालियर में ज्योतिरादित्य के। चार-पांच पीढ़ी पहले की अदावत मुसलसल जारी है। पुरानी अदावत के दस्तावेजी साक्ष्य हैं, लेकिन 1971 से 2025 तक की अदावत का चश्मदीद मैं खुद हूं। दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया से अदावत निभाई और बाद में उनके असमय निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया से भी अदावत निभा रहे हैं, लेकिन दोनों परिवारों के बीच अदावत के बावजूद गजब की खानदानी शालीनता है। आप शायद यकीन न करें और मुमकिन है कि अवसर आने पर खुद दिग्विजय सिंह इसे झूठ और बकवास बता दें, लेकिन मैंने ज्योतिरादित्य की दादी राजमाता के निधन के बाद माधवराव सिंधिया की पगड़ी रस्म में और माधवराव सिंधिया के निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पगड़ी रस्म में दिग्विजय सिंह को वे सब रीति रिवाज़ निभाते देखा है जो अब धीरे-धीरे दुर्लभ हो रहे हैं। इनमें एक राजा का एक महाराजा के सामने मुजरा करना और नेग देना भी शामिल है।
हमने ये उल्लेख इसलिए किया क्योंकि जब भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को 2019 के लोकसभा चुनाव में घेरकर हरा दिया गया था तब राघौगढ़ में जश्न मना था। ज्योतिरादित्य चाहते थे कि मप्र से उन्हें पहली प्राथमिकता वाली राज्यसभा सीट से प्रत्याशी बनाया जाए, लेकिन दिग्विजय सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ से गठजोड़ कर ये सीट हड़प ली। यदि उनके मन में ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति रत्ती भर भी प्रेम होता तो वे ये सीट लेते ही नहीं, लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने मिलकर सिंधिया से पुरानी अदावत भुना कर ही दम लिया। स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में शामिल होने के बाद गांधी परिवार में कमलनाथ की धमक भी कुछ कम हो गई थी। कमलनाथ, संजय गांधी के प्रिय थे और माधवराव राजीव गांधी के प्रिय होने की वजह से नाथ के लिए चुनौती थे।
पिछले दिनों एक निजी समारोह में दर्शक दीर्घा में बैठे दिग्विजय सिंह को हाथ पकड़कर मंच तक ले जाने की जो शालीनता केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिखाई वो उतनी ही नकली थी जितना कि दिग्विजय सिंह का महाराज पिता-पुत्र के आगे कोर्निश करना। इसी घटना के बाद दिग्विजय सिंह ने अपने ऊपर लगे खलनायकी के दाग धोने का अभियान शुरू कर दिया। पहले कहा कि ज्योतिरादित्य भले ही भाजपा में हैं, लेकिन मेरे पुत्र वत हैं। उनके पिता माधवराव सिंधिया और मैंने साथ-साथ काम किया है। दिग्विजय सिंह ने इस घटना के बाद पॉडकास्ट और दूसरे संचार माध्यमों के जरिए खुद को सिंधिया की बगावत के लिए जिम्मेदार होने से बचाने के लिए कमलनाथ को भी मोहरा बनाया और ये साबित करने की कोशिश की कि सिंधिया को कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर करने के लिए जिम्मेदार वे नही बल्कि कमलनाथ हैं। दिग्विजय का कौन सा झूठ सच है और कौन सा सच झूठ है ? ये पकड़ना भगवान के बूते की भी बात नहीं है, क्योंकि दिग्गी राजा झूठ को सच और सच को झूठ बनाने में महारत हासिल राजनीतिज्ञ हैं।
इस पूरे प्रसंग में कमलनाथ ने बहुत संजीदगी का परिचय दिया। उन्होंने दिग्विजय सिंह की बातों का न खंडन किया न समर्थन। उन्होंने एक तरह से इस मामले से पल्ला झाड़ लिया, क्योंकि उन्हें पता है कि दिग्विजय सिंह पर आंख बंदकर भरोसा करने से उन्हें कितना नफा, नुक्सान हुआ ? छिंदवाड़ा की अजेय लोकसभा सीट भी कमलनाथ को दिग्विजय सिंह का साथ निभाने की वजह से गंवाना पड़ी, अन्यथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो उन्हें कोई शिकायत थी ही नहीं। प्रधानमंत्री मोदी से उनका सीधा संपर्क था। 2019 में छिंदवाड़ा लोकसभा से जीते अपने बेटे नकुलनाथ को आशीर्वाद दिलाने कमलनाथ खुद प्रधानमंत्री मोदी के आवास पर गए थे। लब्बोलुआब ये है कि नए जमाने की कांग्रेस में न दिग्विजय सिंह का कोई भविष्य है और न कमलनाथ का। ज्योतिरादित्य कांग्रेस छोड़ ही चुके हैं। फिलहाल उनकी घर वापसी की न कोई जरुरत है और न सूरत, फिर भी वे घर वापसी के लिए एक न एक खिड़की खुली रखना चाहते हैं।
बदले मंजर में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कौन नायक है, कौन खलनायक है तथा कौन अधिनायक है ये तय करना टेढी खीर है। भविष्य में कमलनाथ परिवार भले ही कांग्रेस की राजनीति से दूर चला जाए, लेकिन राघौगढ़ का खीची राजघराना और ग्वालियर का सिंधिया राजघराना अपनी राजनीतिक अदावत को जारी रखने के लिए कमर कसकर तैयार है। दिग्विजय सिंह का बेटा राजनीति में एक मंत्री बनकर पैर जमा चुका है और ज्योतिरादित्य का बेटा महाआर्यमन क्रिकेट के रास्ते राजनीति में प्रवेश कर चुका है। खानदानी अदावत की नई कहानियां अभी समाप्त होने वाली नहीं हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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