राकेश अचल। बिहार में वोट चोर अभियान के एक मंच से किसी उत्साहीलाल ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अच्छा नहीं किया। उस मरदूद को नहीं पता कि कोई भी गाली असभ्यता का परिचायक होती है और इसे सप्रयास रोका जाना चाहिए। गाली-गलौज से किसी भी अभियान की पवित्रता नष्ट होती है। गाली चाहे आम कार्यकर्ता दे या कोई पंत प्रधान, इसे निंदनीय ही कहा जाएगा।
भारतीय राजनीति में गालियों का चलन नया-नया है, कोई एक दशक पुराना। हमने तब भी इस अभियान की निंदा की थी, लेकिन गालियों की जितनी निंदा की गई उनका प्रचलन उतना ही ज्यादा बढ़ गया। गालियां दरअसल सबल का अहंकार और निर्बल का हथियार होती हैं। हमारे बुंदेलखंड में तो सरस गालियां संस्कृति का अभिन्न अंग है। विवाह के मौके पर महिलाएं यदि बारातियों को लय ताल में गालियां न सुनाएं तो बुरा माना जाता है। बाराती गालियां सुनकर महिलाओं को नेग देते हैं। गालियां वर पक्ष के सगे-संबंधियों को नाम सहित दी जाती थीं। मुझे याद है जब मैं बच्चा था तब अपनी मां को गालियां गाते सुनकर आपे से बाहर हो गया था, लेकिन जब बड़ा हुआ तो मुझे गालियों का महत्व और लालित्य समझ में आया। राजनीति में गालियां संस्कृति नहीं, बल्कि असभ्यता का परिचायक हैं। इनका श्री गणेश किसने किया और कब किया ये हम नहीं बता सकते, लेकिन अपनी याददाश्त पर जोर डालते हैं तो लगता है कि राजनीति में गालियां 2014 के पहले चलन में शायद नहीं थीं। श्रीमती इंदिरा गांधी को तब भी किसी ने गाली नहीं दी थी, जब उन्होंने इमरजेंसी लगाई या आपरेशन ब्लू स्टार किया। इंदिरा जी को गालियों से नहीं बल्कि गोलियों से मारा गया।
बात प्रधानमंत्री को मां की गाली देने की है। प्रधानमंत्री का इस गाली से कुछ नहीं बिगड़ने वाला। वे तो गालियों को शक्तिवर्धक रसायन मानते हैं। वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उन्हें रोज दो-तीन किलो गालियां मिलती हैं और इनसे उनकी सेहत और अच्छी होती है। प्रधानमंत्री के इस कथन का किसी मूर्ख, अज्ञानी, औघड ने गलत मतलब लगा लिया शायद, लेकिन उस मूढ ने प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर विपक्ष के अच्छे-खासे वोट अधिकार अभियान का नुकसान कर दिया। गाली देने वाला किस दल का था ये मायने नहीं रखता, मायने ये रखता है कि उसने किस मंच से गाली दी। गाली देने के अपराध के लिए न भादंसं में कोई कड़ी सजा का प्रावधान था न भारतीय न्याय संहिता में कोई प्रावधान है। गाली देने वाले के खिलाफ पुलिस ने रिपोर्ट भी लिख ली है, लेकिन जब तक पुलिस गाली देने वाले को खोजेगी, गिरफ्तार करेगी, आरोप पत्र बनाकर अदालत में दायर करेगी, तब तक बिहार विधानसभा के चुनाव भी हो जाएंगे।
हम कहना चाहते हैं कि वोट अधिकार यात्रा के मंचों पर भाषण देते समय लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी भी आपा खो रहे हैं। वे प्रधानमंत्री के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो भाषा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी फौज के लिए तो ठीक हो सकती है, लेकिन राहुल के लिए बिलकुल नहीं। हमने राहुल गांधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू को, उनके दादा फिरोज गांधी को, उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी को और उनके पिता राजीव गांधी को भाषण देते सुना है और हमें ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि राहुल गांधी ने अपने परिवार की शालीनता से परे भाषण शैली का इस्तेमाल नहीं किया। वे उत्तेजना में आपा खो रहे हैं। राहुल गांधी को याद रखना पड़ेगा कि गाली का जवाब गाली नहीं हो सकती। यदि किसी ने उनकी मां को ‘जर्सी गाय’ कहा तो कहा, ‘बारबाला’ कहा तो कहा। किसी ने मोदी जी के मुरीद शशि थरूर की पत्नी को ‘पांच करोड़ की गर्लफ्रेंड’ कहा तो कहा। किसी ने किसी महिला सांसद की हंसी को ‘सूर्पणखा की हंसी’ कहा तो जनता ने उन्हे दंडित किया। चार सौ तो छोड़िए तीन सौ पार नहीं करने दिया और 240 सीटों पर रोक दिया।
जनता सबकुछ जानती है। कौन घटिया राजनीति कर रहा है ? कौन भाषा की शालीनता भंग कर रहा है ? कौन देश की अस्मिता को मिट्टी में मिला रहा है ? जनता प्रधानमंत्री को भी सुनती है और लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी। सड़क पर भी सुनती है और संसद में भी। इसलिए ये एहतियात बरतना बहुत जरूरी है कि “लरजें न कदम, कोई जुबां बे अदब न हो” नेताओं को हर तरह की उत्तेजना से परहेज करना चाहिए। अन्यथा राहुल बाबा आपके सब किए-धरे पर पानी फिर जाएगा, क्योंकि ‘मोदी एंड संस’ तो फिलहाल सत्ता छोड़ने के मूड में नहीं है। संघ के सरसंघ चालक माननीय डॉ. मोहन भागवत भी इसकी ताईद कर चुके हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Author: Hindusta Time News
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