राकेश अचल। भारत के नवागत मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार से कहा है कि सोशल मीडिया के नियमन के लिए एक मसौदा बनाओ ! जस्टिस सूर्यकांत के इस निर्देश का मतलब तो ये है कि निकट भविष्य में सोशल मीडिया पर शिकंजा कसने वाला है ? सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है उससे सोशल मीडिया की दुनिया में भूचाल आ गया है। सबको उम्मीद थी कि नए मुख्य न्यायाधीश लगातार असंवैधानिक काम कर रही केंद्र सरकार की कान कुच्ची करेंगे, लेकिन हुआ उलटा। उन्होंने सरकार को बेनकाब करने वाले सोशल मीडिया के ही कान ऐंठना शुरू कर दिया।
माननीय अदालत ने कहा है कि सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने से पहले उस सामग्री की स्क्रीनिंग करने की जरुरत है। इसलिए सरकार इसके लिए कानून का मसौदा बनाए। मतलब अब सोशल मीडिया की आज़ादी पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। माननीय अदालत का मानना है कि “सोशल मीडिया पर जो भी कंटेंट जाता है, उसे पोस्ट करने से पहले स्क्रीन किया जाना चाहिए”। अदालत को लगता है कि यूज़र जनरेटेड कंटेंट (यूजीसी) अब देश के माहौल, समाज और न्याय व्यवस्था सब पर असर डालने लगा है। अदालत ने साफ चेतावनी दी कि “अगर आप 10–20 लोगों को गिरफ्तार कर देंगे तो उनमें से 3–4 के खिलाफ झूठे केस भी होंगे। इसलिए सिस्टम चाहिए न कि गिरफ्तारी।” माननीय अदालत ने कई मुद्दे उठाए हैं। जैसे सोशल मीडिया पर भड़काऊ, झूठी, हानिकारक सामग्री आ रही है। सोशल मीडिया व्यक्तियों, संस्थाओं और पूरे समाज को नुकसान पहुंचा रहा है। तकनीक इतनी तेज है कि गलत चीज़ मिनटों में लाखों तक पहुंचती है, उपभोक्ता सृजित सामग्री की वजह से सरकार और अदालत दोनों परेशान हैं।
अदालत मान बैठी है कि “अगर पुलिस हर शिकायत पर एक्शन लेगी तो गलत केस भी बढ़ेंगे। एक स्थाई समाधान चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि— “सरकार की इच्छा हो तो एक महीने में नियम बन सकते हैं”। मतलब साफ है कि माननीय अदालत सिर्फ सुझाव नहीं दे रहा, बल्कि सरकार पर नया कानून बनाने के लिए दबाव बना रही है। माननीय अदालत ने तो जैसे सरकार की मुंह मांगी मुराद पूरी कर दी है। सरकार तो लगातार सोशल मीडिया की मुश्कें बांधने के रास्ते खोज रही थी। अब सरकार नया मसौदा बनाकर सोशल मीडिया की आवाज दबाने के लिए मसौदा बना ही डालेगी।
हमारे सूत्र तो कहते हैं कि मसौदा तो पहले से तैयार है, बस उसे अदालत के सामने पेश करना है। सबसे बडा सवाल है कि माननीय अदालत का निर्देश क्या उसके अधिकार क्षेत्र में आता है। क्या अदालत ने ये निर्देश देकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का रास्ता नहीं खोल दिया। क्या अब सोशल मीडिया उपभोक्ता की हर पोस्ट स्क्रीन होगी ? क्या ये सेंसरशिप नहीं है ? अदालत ने हालांकि स्क्रीनिंग कहा है सेंसरशिप शब्द नहीं, लेकिन दोनों का मतलब एक ही है। स्क्रीनिंग भी सेंसरशिप जैसी ही लगती है। “पोस्ट डालने से पहले स्क्रीनिंग भारत में सोशल मीडिया के इतिहास की सबसे बड़ी सख्ती हो सकती है।
हमें लगता है कि यदि नियम आए तो नीतियों में बदलाव, कंटेंट की मॉनिटरिंग और हर यूज़र पर कुछ न कुछ जिम्मेदारी तय होगी। पूरा विवाद यही है। क्या सरकार और कोर्ट समाज की सुरक्षा कर रहे हैं ? या सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है। आपको याद होगा कि दुनिया में जहां भी सोशल मीडिया को नाथने की कोशिश की गई हैं, वहां दुष्परिणाम ही सामने आए हैं। क्योंकि सोशल मीडिया इंसान की अनिवार्य जरुरत बन गया है। चीन और रूस में भी सोशल मीडिया पर सामग्री डालने से पहले स्क्रीनिंग नहीं होती। अमेरिका में तो बिल्कुल नहीं। आपातकाल के समय जब सोशल मीडिया नहीं था तब अखबारों पर सेंसरशिप लगाई गई थी। फिर जो हुआ सब जानते हैं। हमें लगता है कि भारत में अब सब संविधान के विपरीत खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं।
माननीय अदालत देश में नागरिक अधिकारों के साथ ही अभिव्यक्ति की आजादी की एकमात्र संरक्षक है। यदि वो ही अभिव्यक्ति की आजादी को सीमित करने या प्रतिबंधित करने के लिए सरकार को प्रेरित करेगी, निर्देशित करेगी तो आम आदमी, मीडिया, सोशल मीडिया कहां न्याय और संरक्षण मांगने जाएगा ? याद रहे कि भारत में आधे से अधिक आबादी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती है। सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का मंच भी है, मनोरंजन भी है, बाजार भी है, अस्पताल भी है समाज भी है, परिवार भी है। इसके साथ छेड़छाड़ खतरनाक भी हो सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Author: Hindusta Time News
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