मोदी जी का संघं शरणम गच्छामि

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राकेश अचल। प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी के 12 साल बाद संघ की शरण में जाने के लोग अलग-अलग अर्थ निकाल रहे हैं। संघी कुछ कहते हैं और विपक्ष कुछ ओर, लेकिन हमें इसमें कोई भी नई बात नजर नहीं आती। संघ आख़िरकार मोदी जी का दीक्षा स्थल है और संघ की कृपा दृष्टि से वे 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और फिर लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।
माननीय मोदी जी का संघ यानि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नागपुर मुख्यालय पहुंचना ठीक वैसा ही है जैसा कि किसी की घर वापसी होती है। कहतें हैं कि चाहे बाघ हो, चाहे नाग अंतिम समय में अपनी गुफा या बिल में प्रवेश करके ही शांति अनुभव करता है। माननीय मोदी जी तो मनुष्य हैं ‘नान -बायलोजिकल मनुष्य’ उन्हें भी अंतिम समय में अपनी मांद की, बिल की, घर की याद आना स्वाभाविक है। मोदी जी को अब शायद कोई चुनाव नहीं लड़ना है, इसलिए वे संघ को उसके तमाम अस्त्र-शस्त्र, कवच, कुंडल वापस करने गए हों ताकि संघ उन सब चीजों को मोदी जी के नए उत्तराधिकारी के लिए धो-मांजकर तैयार कर ले। आखिर मोदी जी कब तक प्रधानमंत्री पद पर टिके रह सकते है। इससे पहले कि जनता उन्हें हटाए, संघ खुद उन्हें घर बुला लेना श्रेयस्कर समझेगा।
जहां तक मैं संघ को जानता और समझता हूं उसके मुताबिक संघ अपने विस्तार में बाधक किसी भी अवरोध को दूर करने में कोई संकोच नहीं करता। संघ ने देख लिया है, जान लिया है कि मोदी जी अब 2029 के आम चुनाव के काम के नहीं रहे। वे तीसरी बार प्रधानमंत्री जरूर बन गए, लेकिन उन्हें उन दलों से बैशाखियां लेना पड़ीं जिनका चाल, चरित्र और चेहरा संघ और भाजपा से कतई मेल नहीं खाता। संघ की कोशिश भी है और शायद योजना भी कि मोदी जी को स-सम्मान घर बुला लिया जाए। संघ मोदी जी को आडवाणी गति प्रदान नहीं करना चाहता, क्योंकि मोदी जी ने मनसा, वाचा, कर्मणा संघ की कार्य सूची पर अमल करते हुए देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की दिशा में निशि-याम काम किया है। मोदी जी राष्ट्र निर्माण में इतने व्यस्त रहे कि वे 12 साल में न मणिपुर जा पाए और न नागपुर।
मोदी की कर्तव्य निष्ठा पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता। लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघ का एक प्रचारक जितना निर्मम हो सकता है मोदी जी ने अपने आपको उससे कहीं ज्यादा निर्मम प्रमाणित किया है। आज मोदी जी कि वजह से ही देश का अल्प संख्यक मुसलमान पहली बार सड़कों पर ईद की नमाज नहीं पढ़ सका। मोदी जी से पहले माननीय अटल बिहारी वाजपेयी भी देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन वे भी देश में हिंदुत्व का इतना तीव्र भूडोल नहीं ला सके थे। वे सत्ता में जरूर आए थे, लेकिन न वे जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटा पाए थे और न राम मंदिर बनवा पाए थे। वे तीन तलाक विधेयक भी पारित नहीं करा पाए थे, उनके खाते में महिला शक्ति वंदन विधेयक भी दर्ज नहीं है। हालांकि वाजपेयी जी के मुकाबले मोदी जी पासंग भी नहीं हैं, लेकिन उनके खाते में वे तमाम उपलब्धियां दर्ज हैं जो वाजपेयी जी के खाते में नहीं है।
मोदी जी पक्के शाखा मृग हैं। संघ से मोदी का दिल का रिश्ता है। संघ के लिए वे गौतम बुद्ध की तरह अपनी पत्नी तक का त्याग कर चुके हैं। संघ के साथ उनका रिश्ता दशकों पुराना है। मोदी जी यदि 1972 में संघ की शरण में न आते तो वे कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे। संघ ने उन्हें चाय बेचने के श्रम साध्य धंधे से बाहर निकाला। सन 1972 में नरेंद्र मोदी संघ में शामिल हुए थे प्रचारक बने। फिर संघ के मार्फत ही उन्हें भाजपा में प्रवेश मिला। गुजरात में संगठन की जिम्मेदारी मिली और बाद में वे 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने, लेकिन वर्ष 2023 के आम चुनाव में संघ और मोदी जी की भाजपा के सुर अचानक बदले। मोदी ने संघ परिवार के समानांतर अपना मोदी परिवार बनाया। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा के मुंह से कहलवाया की अब भाजपा को संघ की जरूरत नहीं है। बावजूद इसके मोदी जी कि समझ में आ गया कि वे संघ से बड़े कभी नहीं हो सकते।
संघ ने अपने अपमान का ये घूंट चुपचाप पी लिया, यहां तक कि संघ का शताब्दी वर्ष भी इसीलिए धूमधाम से नहीं मनाया। लेकिन समय रहते मोदी जी को अपनी गलतियों का आभास शायद हो गया और वे अंतत: संघ की शरण में लौट आए। संघ भी यही चाहता है कि मोदी जी अब सिंहासन खाली करें। स-सम्मान करें तो बेहतर अन्यथा संघ को मोदी जी की शाखा लगाने में कोई देर होने वाली नहीं है। आज भी भाजपा में 70 फीसदी संघी ही है। मोदी जी ने हालांकि भाजपा का कांग्रेसीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन संघियों ने प्रवासी यानि दलबदलू कांग्रेसियों को ज्यादा भाव नहीं दिया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बिभीषण आज भी संघियों के लिए अस्पृश्य ही है।
कुल मिलाकर मोदी जी के संघ की शरण में वापस लौटने से भाजपा का नेतृत्व नई पीढ़ी के हाथ में जाने के शुभ संकेत मिले हैं। मुझे लगता है कि अब भाजपा का नया अध्यक्ष और देश का नया पंत प्रधान भी शीघ्र घोषित कर दिया जाएगा। मोदी जी 2029 के लिए सलामी लेने के लिए हमें शायद उपलब्ध न हों।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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