न्याय, अधिकार या विशेषाधिकार पर ज्ञान

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राकेश अचल। कहते हैं कि जब दीपक बुझने को होता है तो उसकी लौ तेज हो जाती है। यही हाल हमारे सीजेआई बीआर गवई का है। वे अपने रिटायरमेंट से ठीक एक पखवाड़ा पहले जजों और वकीलों को बता रहे हैं कि ‘न्याय कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है’। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जजों और वकीलों का यह कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें कि न्याय का प्रकाश समाज के हाशिये पर खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करने पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए जस्टिस गवई ने कहा कि कानूनी सेवा आंदोलन का असली पुरस्कार आंकड़ों या वार्षिक रिपोर्ट में नहीं है, बल्कि उन नागरिकों की शांत कृतज्ञता और नए सिरे से विश्वास में है जो कभी खुद को अनदेखा महसूस करते थे। आपको याद दिला दें कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गवई 24 नवंबर को रिटायर होने जा रहे हैं और उन्होंने अभी कुछ खास मामलों में सुनवाई पूरी होने के बाद भी फैसला नहीं सुनाया है। ये फैसले पता नहीं किस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं। सीजेआई गवई ने कहा कि न्याय कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार है और न्यायाधीशों, वकीलों तथा न्यायालय के अधिकारियों के रूप में हमारी भूमिका यह सुनिश्चित करने की है कि न्याय का प्रकाश समाज के हाशिये पर खड़े अंतिम व्यक्ति तक भी पहुंचे। सीजेआई गवई ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति कानूनी सहायता और सभी के लिए न्याय तक पहुंच को आगे बढ़ाने में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की साझा जिम्मेदारी की पुष्टि करती है।
सीजेआई अपने प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे थे या तंज ये तो पता नहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि सफलता का असली मापदंड संख्या में नहीं, बल्कि आम आदमी के विश्वास में है। इस विश्वास में कि कोई न कोई, कहीं न कहीं, उनके साथ खड़ा होने को तैयार है। जस्टिस गवई ने कहा कि और इसीलिए हमारा काम हमेशा इस भावना से निर्देशित होना चाहिए कि हम जीवन बदल रहे हैं। उन्होंने कहा कि आपकी एक दिन की उपस्थिति, किसी गांव या जेल का दौरा, संकटग्रस्त व्यक्ति से आपकी बातचीत, किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जीवन बदल देने वाली हो सकती है जिसके लिए पहले कभी कोई मदद के लिए नहीं आया। नालसा (राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण) द्वारा अपनी 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कानूनी सहायता को प्रतिक्रियात्मक प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत आंदोलन के रूप में देखा जाना चाहिए। मोदी इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे, जिसमें केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, न्यायमूर्ति गवई के उत्तराधिकारी सूर्यकांत तथा उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के अन्य न्यायाधीश भी शामिल हुए। सीजेआई ने जो कहा उसमें नया कुछ नहीं है। सब जानते हैं कि न्याय विशेषाधिकार नहीं है, लेकिन न्याय को इतना जटिल और मंहगा बना दिया गया है कि आम आदमी आसानी से उसे हासिल ही नहीं कर पा रहा। आज भी हमारी न्याय प्रणाली तारीख पर तारीख के लिए बदनाम है। लोग न्याय तो दूर जमानत के लिए वर्षों वर्ष न्यायालय की देहलीज पर एढियां रगड़ते हुए फोत हो जाते हैं।
जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई को सीजेआई के रूप में काम करने के लिए एक साल ही मिला, लेकिन वे अपने कार्यकाल को ऐतिहासिक बनाने से रह गए। पूर्व सीजेआई चंद्रचूड की तरह हालांकि जस्टिस गवई ने न गणेश परिक्रमा की और न आरती। वे अपंजीकृत आरएसएस के जाल में भी नहीं फंसे, लेकिन विचार के लिए प्रतिबद्ध उनकी माताश्री ने आरएसएस के मंच का बहिष्कार कर उनके लिए परेशानी जरूर खड़ी की। अब सवाल ये है कि 24 नवंबर 2025 के बाद भी क्या जस्टिस बीआर गवई के तेवर यथावत रहेंगे या वे रिटायर होने से पहले प्रेसीडेंशियल रिफ्रेंस के मामले में कोई ऐतिहासिक फैसला सुनाकर कोई नई नजीर छोड़कर जाएंगे ?
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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