बिहार से मध्यप्रदेश में सबक ले कांग्रेस

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भाजपा की नीयत पर शक के बजाए अपनी नीति सुधारे कांग्रेस 
हेमंत आर्य। बहु प्रतीक्षित बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम आज 14 नवंबर को घोषित हो गए। चुनाव परिणामों में भाजपा और उसके सहयोगी जेडीयू ने एकतरफा जीत दर्ज करते हुए विपक्षी दलों को एक बार फिर जबर्दस्त तरीके से धूल चटा दी। बिहार चुनाव परिणामों से कांग्रेस को मध्यप्रदेश में भी सबक लेने की जरूरत है। 2003 से मध्यप्रदेश की सत्ता से बाहर कांग्रेस संगठन यहां भी सुधरने का नाम नहीं ले रहा। भाजपा की नीयत पर शक करने के बजाए कांग्रेस को अपनी नीतियों में सुधार करने की आवश्यकता है।
गौरतलब है कि एसआईआर और “वोट चोर गद्दी छोड़” जैसे नारों के कारण पूरे देश की नजर बिहार विधानसभा चुनाव के बहुचर्चित परिणामों पर थी। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इन मुद्दों को लेकर बिहार सहित पूरे देश में माहौल बनाया, लेकिन चुनाव परिणामों ने इन मुद्दों की हवा निकाल दी। बिहार की जनता ने अपना जनादेश सुना दिया, इन चुनाव परिणामों से सबक लेने के बजाए विपक्षी दलों के नेता अब अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए तरह-तरह के तर्क, वितर्क और कुतर्कों का सहारा लेंगे। बिहार विधानसभा के चुनाव परिणामों से कांग्रेस को मध्यप्रदेश में भी सबक लेने की जरूरत है, क्योंकि पिछले करीब 21 सालों से यहां की सत्ता से बाहर कांग्रेस संगठन यहां भी सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। मध्यप्रदेश में 2028 में विधानसभा चुनाव होना है, लेकिन वर्तमान में कांग्रेस संगठन की जो स्थिति है उसे देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी अभी से यहां हार मान चुकी है। प्रदेश के नेताओं द्वारा 2028 में कार्यकर्ताओं का मन समझाने के लिए सिर्फ विधानसभा चुनाव लड़ने की औपचारिकताएं ही पूरी की जाएंगी।
उल्लेखनीय है कि 2023 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी से बुरी तरह मात खाने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने संगठन में फेरबदल करते हुए जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, लेकिन पिछले करीब 2 वर्षों के दौरान संगठन को मजबूत करने और जमीनी जनाधार वाले नेताओं-कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत पाने में पटवारी पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। जिलों सहित प्रदेश कांग्रेस के संगठन पर अपनी छाप छोड़ने के बजाए पटवारी पिछले 2 वर्षों के दौरान क्षेत्रीय क्षत्रपों के चरण चुंबन और धन बल के दम पर राजनीति करने वाले जनाधार विहीन नेताओं से पीसीसी के खर्चों की वसूली करने में ही लगे हुए हैं। मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में संगठन क्षेत्रीय क्षत्रपों और धन बल की राजनीति करने वाले नेताओं के ठेके पर ही चल रहा है। संगठन सृजन अभियान में पार्टी हाईकमान के नाम पर मध्यप्रदेश में पार्टी कार्यकर्ताओं को ठगने से भी प्रदेश के नेता नहीं चूके। इस अभियान के बाद मध्यप्रदेश में पार्टी के जमीनी जनाधार वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं का भरोसा संगठन के दिल्ली दरबार से भी उठ गया है। इस अभियान की शुरुआत में पारदर्शिता के जितने दावे किए गए थे, जिला अध्यक्ष नियुक्तियों में सब हवा हवाई हो गए। धन बल की राजनीति करने वाले नेताओं ने दिल्ली दरबार से सूची जारी होने से पहले ही अपने क्षेत्र में जिला अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर दी थी। जब क्षेत्रीय क्षत्रप और धन बल की राजनीति करने वाले ही संगठन के सभी निर्णय ले रहे हैं तो प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी की आवश्यकता ही नहीं है मध्यप्रदेश में।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस संगठन कार्पोरेट छवि से बाहर निकलकर जमीनी नेताओं और जनाधार वाले कार्यकर्ताओं तक पहुंच ही नहीं पा रहा है। ठेकेदारों, कारोबारियों और क्षेत्रीय क्षत्रपों ने संगठन को इस तरह शिकंजे में लिया हुआ है कि यहां के अध्यक्ष और प्रभारी उनके चंगुल से बाहर ही नहीं निकल पाते। ये सूटकेसों में लक्ष्मी दर्शन कर धृतराष्ट की तरह उनकी हां में हां मिलाकर पार्टी का बंटाढार करने में ही लगे रहते हैं। वरिष्ठ नेताओं पर टिकिट बेंचने के आरोप तो पार्टी कार्यकर्ता पिछले चुनावों में लगाते रहे हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि अब स्थिति प्रमुख पदों की नीलामी तक जा पहुंची है। इसी कारण हाईकमान से पहले ही धन बल की राजनीति करने वाले नेता संगठन में नियुक्त होने वाले नामों और टिकिटों की घोषणा कर देते हैं। हमारे शाजापुर जिले में तो साल 2028 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के टिकिटों की घोषणा अभी से हो चुकी है। कार्यकर्ताओं और मतदाताओं द्वारा बार-बार नकारे गए नेता अब अपने पारिजनों को उत्तराधिकारी घोषित कर कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की तैयारियों में जुट गए हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मतदाताओं की नब्ज समझकर पढ़ पाना तो दूर की बात अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का मन तक नहीं पढ़ पा रहे हैं। सत्ता विरोधी लहर और भाजपा की गुटबाजी के कंधों पर सवार होकर कांग्रेस मध्यप्रदेश की सत्ता में वापसी करना चाहती है, जो कि मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
बहरहाल कांग्रेस यदि मध्यप्रदेश में पार्टी को जिंदा कर सत्ता में वापसी करना चाहती है तो सबसे पहले क्षेत्रीय क्षत्रपों और धन बल की राजनीति करने वाले नेताओं और उनके परिजनों को घर बैठाना होगा। पटवारी यदि पीसीसी के खर्चों के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इस्तीफा देकर पार्टी कार्यकर्ता के रूप में काम करें, लेकिन उनके पद की गरिमा को तार-तार तो न करें। वर्तमान में प्रदेश के लगभग हर जिले में कोई न कोई नेता कांग्रेस का ठेकेदार बना हुआ है, जिसने अपने क्षेत्र के कार्यकर्ताओं में स्वयं को प्रदेश अध्यक्ष से अधिक प्रभावशाली घोषित कर रखा है। राजनीति में ऐसी स्थिति तभी बनती है जब लेन-देन के सभी विकल्प खुले हुए हों। मध्यप्रदेश में सुधरने के लिए कांग्रेस के पास अभी भी कुछ समय है, अन्यथा 2028 में हार का ठीकरा फोड़ने के लिए ईवीएम तो जिंदाबाद है ही।

                                   हेमंत आर्य

Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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