भले आदमी ! आपातकाल की क्या जरुरत ?

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राकेश अचल। आप ल्यूक क्रिस्टोफर कॉउटिन्हो को नहीं जानते। हम भी उन्हें नहीं जानते। लोग ल्यूक क्रिस्टोफर को जान भी नहीं पाते यदि ये भला आदमी भारत की सबसे बड़ी अदालत से भारत में स्वास्थ्य आपातकाल लगाने की गुहार न करता तो। ल्यूक सर एक भारतीय जीवन शैली गुरु और एकीकृत एवं जीवनशैली चिकित्सा के क्षेत्र के विचारक हैं, जो स्वास्थ्य के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे हैं। वह उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोषण, व्यायाम, नींद, इमोशनल डिटॉक्स और अध्यात्म जैसे पांच स्तंभों पर जोर देते रहे हैं। वे यू केयर वेलनेस प्रोग्राम के संस्थापक हैं और स्वास्थ्य पर बेस्ट सेलिंग पुस्तकें लिखने के लिए जाने जाते हैं। वह वायु प्रदूषण जैसे सामाजिक मुद्दों के समाधान के लिए भी सक्रिय रहे हैं।
ल्यूक सर ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाकर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट से अधिकारियों को वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के ठोस उपाय करने का निर्देश देने की मांग की है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों और शहरों में बढ़ते प्रदूषण और दमघोंटू हवा के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट में पेश अपनी जनहित याचिका में राष्ट्रीय स्तर पर “सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल” लागू करने की भी मांग की है, ताकि ग्रामीण से लेकर शहरी स्तर तक लोगों को प्रदूषण के गंभीर परिणामों से बचाया जा सके। ल्यूक क्रिस्टोफर कॉउटिन्हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिट इंडिया मूवमेंट के वेलनेस चैंपियन रहे हैं। याचिका में उन्होंने तर्क दिया है कि एक व्यापक नीतिगत ढांचे के बावजूद, ग्रामीण और शहरी भारत के बड़े हिस्से में वायु की गुणवत्ता लगातार खराब बनी हुई है और कई मामलों में यह बदतर स्तर को भी पार कर गई है। याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु आदि प्रमुख भारतीय शहरों में PM₂.₅ और PM₁₀ जैसे प्रदूषकों का वार्षिक औसत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अधिसूचित राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानको 2009 के तहत निर्धारित सीमा से लगातार अधिक बना हुआ है। याचिकाकर्ता ल्यूक ने कोर्ट को बताया है कि दिल्ली में PM₂.₅ का वास्तविक वार्षिक औसत स्तर लगभग 105 μg/m³ दर्ज किया गया है, जबकि कोलकाता में लगभग 33 μg/m³ और लखनऊ में लगभग 90 μg/m³ दर्ज किया गया है, जो भारतीय मानकों का उल्लंघन है।
इस समस्या से निपटने में अधिकारियों की विफलता को उजागर करते हुए याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 1.4 अरब से ज़्यादा नागरिक हर दिन जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। उन्होंने आगे कहा कि वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रमों से ग्रामीण क्षेत्रों का बहिष्करण एक बुनियादी ढांचागत कमज़ोरी को दर्शाता है। हमें लगता है कि ल्यूक सर को ये पता नहीं कि भारत में केवल स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही नहीं अपितु हर क्षेत्र में आपातकाल की जरूरत है और अघोषित रूप से आपातकाल लगा भी है। यदि न लगा होता तो क्या सोनम वांग्चुक को एनएसए के तहत गिरफ्तार किया जाता और बिहार में सरेआम मतदाताओं को धमकाने वाले केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को खुला छोड़ दिया जाता। हमें तो लगता है कि पूर्व मंत्री आरके सिंह बिहार सरकार पर 70 हजार करोड़ रुपए का बिजली घोटाला करने का आरोप लगाकर अब तक आजाद कैसे हैं।
भले आदमी ल्यूक को मालूम नहीं कि देश में किसी भी तरह का आपातकाल लगाने के लिए किसी कोर्ट की इजाजत नहीं लगती। न पचास साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कोर्ट से पूछकर आपातकाल लगाया था और न आज के प्रधानमंत्री को इसकी जरुरत है। रही बात स्वास्थ्य की तो केवल आबोहवा ही नहीं देश में सबकुछ खराब हो चुका है। आपातकाल लगाकर क्या-क्या सुधारा जा सकता है ?
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

“श्री राकेश अचल जी मध्यप्रदेश के ऐसे स्वतंत्र लेखक हैं जिन्होंने 4 दशक (40 साल) तक अखबारों और टीवी चैनलों के लिए निरंतर काम किया। देश के प्रमुख हिंदी अखबार जनसत्ता, दैनिक भास्कर, नईदुनिया के अलावा एक दर्जन अन्य अखबारों में रिपोर्टर से लेकर संपादक की हैसियत से काम किया। आज तक जैसे टीवी चैनल से डेढ़ दशक (15 सालों) तक जुड़े रहे। आकाशवाणी, दूरदर्शन के लिए नियमित लेखन किया और पिछले 15 सालों से स्वतंत्र पत्रकारिता तथा लेखन कर रहे है। दुनिया के डेढ़ दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर चुके अचल ने यात्रा वृत्तांत, रिपोर्टज, गजल और कविता संग्रहों के अलावा उपन्यास विद्या पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं”।
Hindusta Time News
Author: Hindusta Time News

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