राकेश अचल। बिहार विधानसभा चुनाव में मिली कामयाबी के बाद भी क्या भाजपा बिहार को एक स्थाई सरकार दे पाएगी ? बिहार में स्थाई सरकार बनाने के लिए सबसे पहले तो गठबंधन धर्म निभाने में ईमानदारी की जरूरत है, जिसकी उम्मीद भाजपा से कम ही की जा सकती है।
भाजपा ने बिहार विधानसभा की 243 में से 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 89 सीटें जीत तो लीं, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी भाजपा अपने मन की सरकार नहीं बना सकती। केंद्र की तरह बिहार में भी भाजपा को एक से अधिक बैशाखियों की जरुरत है। भाजपा को या तो मुख्यमंत्री पद पर जदयू से समझौता करना पड़ेगा या फिर जदयू, कांग्रेस और राजद में से कुछ विधायक खरीदने पड़ेंगे। विधायकों की खरीद फरोख्त में सिद्धहस्त भाजपा के लिए सहयोगी जदयू गले की हड्डी बन गई है। जदयू के पास 85 विधायक हैं। इस लिहाज से यदि मुख्यमंत्री पद जदयू को न मिला तो जदयू भी तोड़फोड़ और नया गठबंधन बनाकर सरकार बनाने का विकल्प खोलकर रख सकती है। जदयू भी महागठबंधन के साथ मिलकर बहुमत के लायक सीटें कबाड़ सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार की अस्मिता के नाम पर एनडीए में शामिल लोजपा, हम और आरएलएम को महागठबंधन में शामिल करने का प्रयोग कर सकते है।
बिहार में भाजपा का एक छत्र राज करने का सपना शायद ही कभी पूरा हो। भाजपा को सब्र से काम लेते हुए मन मारकर नीतीश कुमार को झेलना ही पड़ेगा। भाजपा यदि जदयू को तोड़ने का दुस्साहस करती है तो ये उसे बहुत भारी पड़ सकता है। भाजपा अभी जदयू के अलावा लोजपा, हम, आरएलएम के सहारे है। ये सभी क्षेत्रीय दल हैं जो भाजपा के बजाए जदयू के साथ ज्यादा सहज हैं। हम तो पहले भी जदयू के साथ रह चुकी है। भाजपा की मजबूरी ये है कि वो पहले ही कौर में मक्खी नहीं निगल सकती। एक बार सत्ता में आने के बाद भाजपा जदयू, आरजेडी और कांग्रेस में तोडफोड कर अपनी ताकत बढ़ा सकती है, लेकिन ये आसान प्रक्रिया नही है। इसलिए अगले 48 घंटे में भाजपा को मुख्यमंत्री पद पर नीतिश कुमार के नाम की घोषणा करना पड़ सकती है। जदयू अध्यक्ष के रूप में पार्टी को टूटने से बचाने के लिए नीतीश बाबू को भी ऐढी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा।
भाजपा के लिए एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाई। भाजपा यदि शिव सेना की तरह जदयू में तोडफोड करती है तो दिल्ली में उसकी सरकार लड़खड़ा सकती है। भाजपा फिलहाल ये जोखिम ले नहीं सकती, क्योंकि अगले साल उसे पांच और विधानसभा चुनाव लड़ना हैं। भाजपा गठबंधन धर्म के मकड़जाल में ऐसी उलझी है कि बाहर निकल नहीं पा रही। नीतीश कुमार के सामने भी कई विकल्प हैं। वे भाजपा से अपने अपमान का बदला लेना चाहें तो ये उनके लिए स्वर्णिम अवसर है। वे भाजपा के साथ सरकार में शामिल न होकर भाजपा को बाहर से समर्थन देकर अपनी साख बनाए रख सकते है। साथ ही जब चाहे तब भाजपा सरकार गिरा सकते हैं। भाजपा से अपने अपमान का बदला लेकर नीतीश महागठबंधन के साथ सरकार बनाने के विकल्प का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।
गठबंधन धर्म निभाने में भाजपा और जदयू का रिकार्ड अच्छा नहीं है। सत्ता हासिल करने के लिए जदयू ने पहले भी अपने सिद्धांतों की बलि दी है। जदयू भाजपा के अलावा राजद के साथ भी सरकार बना और बिगाड़ चुकी है। अब देखते हैं बिहार की किस्मत में क्या लिखा है ?
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Author: Hindusta Time News
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